चाहती हूँ

दिवार पर टंगी एक फोटो नहीं

दिल में बसी एक याद बनना चाहती हूँ

दिखावे के आंसू नहीं

हर याद की मुस्कान बनना चाहती हूँ

तरक्की की ऊचाई पर अकेले अहम नहीं

सब का साथ और प्यार चाहती हूँ

माना आज के युग महत्त्वाकाक्षीं न होना गुनाह हैं

पर क्या करू बस दिल से यही चाहती हूँ ।

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ढाई आखर

ढाई अक्षर प्रेम के

मतलब इसके सब भिन्न हुए

कुछ छुपे लोभ और माया में

कुछ कोमल काया में  लिप्त हुए

जीने मरने की कसमों में 

कभी झूठ लगे कभी सत्य हुए 

जीवन की आपा धापी में

ये भाव भी मन के  सुप्त हुए

प्रेम नहीं बस पाना हैं 

ये त्याग भाव भी रखता हैं

पर ईर्ष्या और द्वेष की अाग में

ये ढाई अक्षर मृत्य हुए ।

बातें

बहुत सी बातें है मन मॆं

पर किससे कहे हम

कब तक यूही इंतजार करे

उस ईतवार का 

जब वो हमारी बात सुन पाए

और शायद अपनी कुछ बात कह पाए 

बोलना भी  एक काम लगता हैं

चुप रह कर दिन निकल जाते हैं

खुद से सवाल करते हैं

खुद ही जवाब दे जाते हैं

गैरों से बात करने के लिए पूरा दिन हैं

पर अपनो के  लिए र्फू्सत ही नहीं

चलो आज हम भी किसी गैर से

अपनी कुछ बातें कह जाते हैं ।

चिठ्ठी के दौर

जब निकले कभी घर से दूर

तो मन भर जाता था

हाथ उठ  फिर, कलम पर जाता था

और शूरू हो जाते थे

चिठ्ठी के दौर 

मन की एक एक बात

हम चिठ्ठी में लिख जाते थे 

दिल कहता था सब लिख दे पर

शब्द भी कम पड़ जाते थे

और शूरू हो जाते थे

चिठ्ठी के दौर 

प्यार बहुत हम करते हैं 

याद बहुत तुम आते हो

पर इस भावना को शब्दों में हम कैसे नापे

ये सोच सोच कर कैसे वक्त गुजर जाता था

और शूरू हो जाते थे

चिठ्ठी के दौर 

आज भी हमनें उन खतों को संभाला हैं 

जिन में स्नेह और प्यार महकता हैं

क्या फिर कभी आ पाएगें वो 

चिठ्ठी के दौर

न समय रहा न रहा वो प्यार

न अब करे कोई इंतजार

अब कागज के पन्नों की जगह फोन ने ले ली हैं 

पर क्या वो खुशबु शब्दों की इनमें से आ पाएगी

इंतजार का अानंद क्या वो दे पाएगी

कभी जीवित थे अब नहीं रहे वो 

चिठ्ठी के दौर ।

 

 

 

माँ जैसी

गोदी से घुटनों पर आई 

कब पैरो पर खड़ी हुई

माँ तेरी ममता की छांव में

जाने कैसे बड़ी हुई

सुबह से लेकर शाम तक

तू मुझ पर प्यार लूटाती हैं

मेरी छोटी सी चोट पर

माँ तू कितने नीर बहाती है 

क्या मैं कभी तूझे माँ

इतना ्स्नेह कर पाऊंगी

तू जीती हैं मेरे लिऐ माँ

क्या मैं भी तूझ जैसी बन पाऊंगी